Saturday, October 20, 2012

हम तुम


हम-तुम थे कितने रंगीन,
रहते हरदम मस्त-तल्लीन.
आँखों पर छाया अँधियारा,
'हम' ने 'उस' को गले लगाया.

एच  आई वी पॉजिटिव का झटका,
'हम' ने 'उस' के प्यार में पाया.

'हम-तुम' की रंगीन जवानी,
पल में हुई रंगहीन कहानी.
क्षण भर की खुशी के खातिर
जीवन भर का रोग लगाया.

इसीलिए  कहते हैं बन्धु,
धैर्य, संयम, आत्म-नियन्त्रण,
पल-पल रखे महकता जीवन.

जीवन  साथी सदा एक हो
एड्स  भला फिर कैसे हो
'हम-तुम' में कभी 'वो' ना आये
प्राण जाए पर वचन ना जाए.

Sunday, October 7, 2012

तन्हा मन

एक  गम है दिल में किसे बताऊँ
छुपाना भी चाहूँ तो किससे छुपाऊँ
है कोई नहीं जो समझता है मुझको
नहीं ऐसा कोई जिसे मैं समझ पाऊँ

हजारों की महफिल, हूँ फिर भी अकेले
कोई काश कहता "चलो साथ मेरे"
किसी को जो समझा कभी मैंने अपना
ज़रूरत पड़ी तो हुआ वो बेगाना

ये सच है ज़माने मैं आई हूँ तन्हा
जाना है तन्हा यह भी मैंने माना
मगर फिर भी चाहूँ सहारा किसी का
हो इंसान या कोई ईश्वर का साया

समझती हूँ युग आज अच्छा नहीं है
तभी तो कोई शख्स सच्चा नहीं है
अपने इरादों पर मुझको यकीं है
मन में मेरे कोई छल भी नहीं है

मगर दुःख का कारण यही मेरा मन है
शायद ज़रूरत से ज्यादा धनी है
ना कोई बुराई बुरी लगती इसको
ना कोई कदम ही गलत मानता है

है  जैसा मासूम है जैसा भोला
समझता सभी को है ये अपने जैसा
संसार का छल समझ ही ना पाता
मंझधार में है अपनी नैया फंसाता

इसी मन को करना है वश में मुझे अब
इसी मन से लड़ना है अपने लिए अब
इसी मन को है अपना साथी बनाना
इसी मन से है खुद की दुनिया सजाना

नहीं आरज़ू अब किसी  हमसफ़र की
तमन्ना नहीं अब किसी रहगुज़र की
खुद को पराया कर ही लिया जब
नहीं चाहिए अब कोई हमदर्द भी

-दीपा
२८ जून १९९९

मेरा-तेरा

मैं  तुम हूँ या तुम मैं हो
यह  भेद कौन बतलाये
मैं  तुम, तुम मैं हो जाओ
फिर क्या अंतर रह जाए

अंतर क्या रह जाए
तुममें मैं, तुम मुझमें
जान सके यह भेद
भला यह ज्ञान है किसमें

मेरा  मुझमें क्या है
तुझमें तेरा क्या है
मेरा-तेरा कहते हो
क्या तुम्हें पता है

क्या तुम्हें पता है
मेरे मैं में तेरा क्या है
या तेरे तुम में
मेरा क्या-क्या है

मेरे  तन में तेरा मन है
या मेरा है
तेरे मेरे मन में
क्या मेरा-तेरा है

मैं तुझमें राम जाऊँ
या तू मुझमें राम जा
भेद समझना जो चाहो
मैं तुम हो जाऊँ, तू मैं हो जा

मैं तुम का यह अंतर
जो पार पा गया
जीवन रुपी ज्ञान का
समझो सार पा गया

 मैं तुम हूँ, तुम मैं हूँ
यह कोई भेद नहीं है
जीवन-मृत्यु का सार है यह
कोई खेल नहीं है

मेरे अंतर तेरे अंतर में
क्या अंतर है
जो तेरा है वह मेरा है
यही जीवन-मंतर है

- दीपा
१३ मई २००९

Friday, October 5, 2012

मेरा सपना

उमंगें कई हैं, इरादे अटल हैं
मेरी तमन्नाओं की दुनिया बड़ी है

आसमानों से ऊपर है मुझको जाना
सितारों की दुनिया है अपना बनाना

आकाश से काली बदली हटाकर
आशा का सूरज है उसमें उगाना

समंदर की गहराई से गहरा उतरकर
अंतर की शुद्धता है सबको दिखाना

सागर की सीपों से मोतियाँ चुनकर
उम्मीदों का है मुझको माला बनाना

सबकी उम्मीदों को सहस बनाकर
सपना सभी का है साकार करना

लगन और परिश्रम की बुनियाद पर
मंजिल का अपनी है रास्ता बनाना

सच और ईमान के दायरे में रहकर
जीवन का हर लक्ष्य है मुझको पाना

शोहरत की ऊँची बुलंदी को पाकर
धरातल  पर है अपनी जड़ें गड़ाना

जीवन का हर क्षण सुखमय बनाकर
मृत्यु का भी है आनन्द उठाना.

दीपा
१९ जून २००१

पागल मन


सोच ज़रा ऐ पागल मन,
तू क्यों रोता है अपना गम!
है समय अभी, कुछ दम तो ले
दुःख के प्रवाह को थमने दे


ना हावी होने दे खुद पर
इस चंचल मन की चंचलता
है धैर्य और साहस तुझमें
सादी सी तेरी सुन्दरता

होकर मुक्त सभी बंधन से
देख ज़रा मन की आँखों से
वो प्रेम नहीं जिसके खातिर
नज़रें चुराओ अपनों से

प्रेम है वो अनुपम उपहार
जो मिला हमें इस कुदरत से
प्रेम है वो अलौकिक सुख
जिसके खातिर जीवन तरसे

प्रेम  ना बंधता बंधन में
प्रेम ना मिलता मांगे से
प्रेम ना बिकता हाट-बाज़ार
प्रेम ना होता कभी हठ से

प्रेम  सदा ऊपर रहता है
तन-मन की हर अभिलाषा से
प्रेम सदा आगे रहता है
स्वार्थ की हर तत्परता से

प्रेम है ऐसी मनोदशा
जिसकी नहीं कोई दिशा
रुचे जहाँ ऐ मन तुझको जो
रमें वहाँ की हर एक दशा

जहाँ रहे थोड़ी भी शंका
तिनका सा भी अविश्वास हो
है कुछ भी पर प्रेम नहीं वो
उससे अपना ध्यान हटा लो

प्रेम को समझो प्रेम को जानो
प्रेम को अपना सबकुछ मानो
पर झूठे जज़्बात में आकार
प्रेम का ना यूँ नाम बिगाड़ो

प्रेम सूक्ष्म है, प्रेम है ईश्वर
प्रेम ही गीता, प्रेम कुरान
प्रेम  तो है हर जग से सुन्दर
प्रेम से है हर मन की शान

ऐ मन सुन ले प्रेम की वाणी
प्रेम से बड़ी ना कोई कहानी
प्रेम सुनाये अपनीज़ुबानी
प्रेम  है हर धड़कन की रानी

प्रेम अजर है, प्रेम अमर है
ऐ मन तू भी अजर-अमर है
प्रेम तेरे ही अन्दर बसता
तू ही तो इस प्रेम का घर है.

-दीपा
१९ जून २००१

Thursday, October 4, 2012

तितली रानी

तितली रानी तितली रानी
कहाँ से तुम आई हो?
तितली रानी तितली रानी
कितने रंग लाई हो?

तितली रानी तितली रानी
इतनी  सुन्दर क्यों हो?
तितली रानी तितली रानी
फूलों के संग क्यों हो?

तितली बोली, "प्यारे मुन्ने"
सुन लो मेरी कहानी
रंग-बिरंगे पंख हैं मेरे
मैं बगिया की रानी

रंग जहाँ में जितने देखे 
सब हैं मेरे अन्दर
पंख पसारे मंडराती हूँ
इसीलिए हूँ सुन्दर

बाग़-बगीचे, सुन्दर वन-उपवन
सब मेरे ठौर-ठिकाने
फूलों से है जीवन मेरा
इसीलिए संग इनके

दूर से देखो करतब मेरे करतब
मन  होगा फिर हर्षित
पास जो आकार छूओगे 
मैं हो जाऊँगी मूर्छित

जैसे तुम हो एक कृति 
उस परमपिता ईश्वर की
मेरे भी हैं वही रचयिता
लाज रखो कुछ उनकी

मुन्ना  बोला, "तितली रानी"
डरो नहीं तुम मुझसे
पंख  पसारे उड़ा करो तुम 
मेरे  घर-आँगन में

साथ-साथ हम खेलेंगे 
लुका-छुपी का खेल
फूलों में तुम छुप जाना
मैं करूँगा उनसे मेल

बचपन की यह बातें 
तितली रानी भूल ना जाना
रंग-बिरंगे इन पंखों संग 
मेरे सपनों में आना.

-दीपा
२६ मार्च २०१२

Wednesday, October 3, 2012

एक नई शुरुआत

अबतक इस ब्लॉग पर आपने जो कुछ भी पढ़ा है वह एक टीवी चैनल के लिए लिखे गए मेरे विभिन्न कृतियों के कुछ अंश हैं. अब इस ब्लॉग को मैं एक नया रूप देना चाहती हूँ. इसके लिए मुझे आपके सहयोग की आवश्यकता है.

अब इस ब्लॉग के माध्यम से मैं स्वरचित कहानियों, प्रसंगों और लेखों को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहती हूँ. यदि आपको मेरा यह प्रयास पसंद आये तो ज्यादा  से ज्यादा लोगों तक इसकी जानकारी पहुचाकर मेरी इस कोशिश को कामयाब करें.

आपकी  आभारी
दीपा