Tuesday, December 16, 2008

अरमान

ख़्वाहिशें अरमान बन कर रह गयीं
मंज़िलें महफ़िल सजाती रह गयी
हम अभी सपनों में बस खोये ही थे
नीन्द आंखों से जाती रह गयी॥

हौसलों के पंख फैलाये हुए
बादलों के पार जाने के लिये
अपने अरमानों को हमने दी हवा
पल में तूफाँ बेसहारा कर गये॥