सोच ज़रा ऐ पागल मन,
तू क्यों रोता है अपना गम!
है समय अभी, कुछ दम तो ले
दुःख के प्रवाह को थमने दे
ना हावी होने दे खुद पर
इस चंचल मन की चंचलता
है धैर्य और साहस तुझमें
सादी सी तेरी सुन्दरता
होकर मुक्त सभी बंधन से
देख ज़रा मन की आँखों से
वो प्रेम नहीं जिसके खातिर
नज़रें चुराओ अपनों से
प्रेम है वो अनुपम उपहार
जो मिला हमें इस कुदरत से
प्रेम है वो अलौकिक सुख
जिसके खातिर जीवन तरसे
प्रेम ना बंधता बंधन में
प्रेम ना मिलता मांगे से
प्रेम ना बिकता हाट-बाज़ार
प्रेम ना होता कभी हठ से
प्रेम सदा ऊपर रहता है
तन-मन की हर अभिलाषा से
प्रेम सदा आगे रहता है
स्वार्थ की हर तत्परता से
प्रेम है ऐसी मनोदशा
जिसकी नहीं कोई दिशा
रुचे जहाँ ऐ मन तुझको जो
रमें वहाँ की हर एक दशा
जहाँ रहे थोड़ी भी शंका
तिनका सा भी अविश्वास हो
है कुछ भी पर प्रेम नहीं वो
उससे अपना ध्यान हटा लो
प्रेम को समझो प्रेम को जानो
प्रेम को अपना सबकुछ मानो
पर झूठे जज़्बात में आकार
प्रेम का ना यूँ नाम बिगाड़ो
प्रेम सूक्ष्म है, प्रेम है ईश्वर
प्रेम ही गीता, प्रेम कुरान
प्रेम तो है हर जग से सुन्दर
प्रेम से है हर मन की शान
ऐ मन सुन ले प्रेम की वाणी
प्रेम से बड़ी ना कोई कहानी
प्रेम सुनाये अपनीज़ुबानी
प्रेम है हर धड़कन की रानी
प्रेम अजर है, प्रेम अमर है
ऐ मन तू भी अजर-अमर है
प्रेम तेरे ही अन्दर बसता
तू ही तो इस प्रेम का घर है.
-दीपा
१९ जून २००१
1 comment:
" divya-drishti ka bhaw naa janu..
Naa janu, Man ki jigyasha..
Adhar rah mey man hai mera.."
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