Sunday, October 7, 2012

तन्हा मन

एक  गम है दिल में किसे बताऊँ
छुपाना भी चाहूँ तो किससे छुपाऊँ
है कोई नहीं जो समझता है मुझको
नहीं ऐसा कोई जिसे मैं समझ पाऊँ

हजारों की महफिल, हूँ फिर भी अकेले
कोई काश कहता "चलो साथ मेरे"
किसी को जो समझा कभी मैंने अपना
ज़रूरत पड़ी तो हुआ वो बेगाना

ये सच है ज़माने मैं आई हूँ तन्हा
जाना है तन्हा यह भी मैंने माना
मगर फिर भी चाहूँ सहारा किसी का
हो इंसान या कोई ईश्वर का साया

समझती हूँ युग आज अच्छा नहीं है
तभी तो कोई शख्स सच्चा नहीं है
अपने इरादों पर मुझको यकीं है
मन में मेरे कोई छल भी नहीं है

मगर दुःख का कारण यही मेरा मन है
शायद ज़रूरत से ज्यादा धनी है
ना कोई बुराई बुरी लगती इसको
ना कोई कदम ही गलत मानता है

है  जैसा मासूम है जैसा भोला
समझता सभी को है ये अपने जैसा
संसार का छल समझ ही ना पाता
मंझधार में है अपनी नैया फंसाता

इसी मन को करना है वश में मुझे अब
इसी मन से लड़ना है अपने लिए अब
इसी मन को है अपना साथी बनाना
इसी मन से है खुद की दुनिया सजाना

नहीं आरज़ू अब किसी  हमसफ़र की
तमन्ना नहीं अब किसी रहगुज़र की
खुद को पराया कर ही लिया जब
नहीं चाहिए अब कोई हमदर्द भी

-दीपा
२८ जून १९९९

1 comment:

Dhiraj Kumar said...

badhiya likhlau bhabhi, ee man bahut kuch samjhabait rahait achhi.