Monday, December 24, 2007

Ehsaas

हो गया अपराध इनसे
जानकर , अनजाने में

हैं मगर इंसान ये भी
सच है क्यों ना मान लें

अपराधियों को छोड़ क्यों ना
जुर्म से अब हम डरें

बाक़ी है इनमें अभी
ज़िंदगी जीने की आस

देर से ही है जगी
अब है इनको भी एहसास॥

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